अधिकार

अधिकार
यह कैसा जीवन मेला है
अधिकार है पर प्यार नहीं
सब ओर जल से घिरा हुआ
जल है पर पेय जलधार नहीं
अधिकार है पर प्यार नहीं
खजूर पेड़ सा खड़ा हुआ
पथिक को तनिक विश्राम नहीं
किस काम में हूँ पड़ा हुआ,
सकाम हूँ निष्काम नहीं
अधिकार है पर प्यार नहीं
सशक्त हूँ मन शक्ति से
उद्देश्यों की बहुरक्ति से
सशक्त हूँ लाचार नहीं
फिर क्यों, फिर क्यों,
अधिकार है पर प्यार नहीं
संसार है पर सार नहीं,
अधिकार है पर प्यार नहीं।
रचयिता
आशीष कुमार त्रिपाठी “अलबेला”