देवी दुर्गा के अष्टभुजा स्वरूप का रहस्य

||श्री सद्गुरवे नमः||
देवी दुर्गा के अष्टभुजा स्वरूप का रहस्य
दिनांक 25.3.2018 चैत्र नवरात्रि, रामनवमी को पूर्णाहुति के शुभ अवसर पर सद्गुरुधाम आश्रम नांगलोई, दिल्ली में सदगुरुदेव के आशीर्वचन…….
प्रिय आत्मन्,
आज अष्टमी और नवमी दोनों है| देखो यह आस्था का, विश्वास और श्रद्धा का पर्व है नवरात्रि| तभी तो विश्व में भारतवर्ष ही ऐसा देश है जहाँ गोबर से भी गणेश बन जाता है, मिट्टी से महादेव बनता है तथा पत्थर से परमात्मा बन जाता है| यह भाव है हिन्दू सभ्यता और संस्कृति में| भारत के ही लोग हैं, जो देखते हैं कि वह परमात्मा मुझे बनाए जा रहा है और भारत ही एक ऐसा देश है जो परमात्मा को भी बनाता है| नवरात्र में क्या किया जाता है? वह सृजन करता है| देवी को बनाता है, उस देवी की पूजा करता है खूब प्रेम से; और ले जाकर पुनः विसर्जित कर देता है| गंगा में प्रवाहित कर देता है| विश्व के लोग कहते हैं कि यह ऐसा खेल क्यों करता है? लाखों-लाख खर्च करता है, करोड़ों-करोड़ खर्च करता है; जिस उत्सव से बनाता है, उसी उत्सव से पूजा करता है- आराधना करता है और उसी उत्सव से नाचते हुए विसर्जन भी कर देता है| यह विश्व के लिए एक दृष्टान्त है, जिसमें वह कहता है कि परमात्मा भी हमको ख़ुशी-ख़ुशी बनाता है, ख़ुशी-ख़ुशी पालता है, ख़ुशी-ख़ुशी हमको खिलाता है और हमको भी ख़ुशी-ख़ुशी अपने यहाँ बुला लेता है, तो मैं क्यों न परमात्मा को बनाऊँ? ख़ुशी-ख़ुशी उसकी पूजा करूँ, ख़ुशी-ख़ुशी उसका विसर्जन कर दूँ? तो यह परमात्मा का खेल दोनों तरफ चल रहा है| इसीलिए कहा गया है कि यह मनुष्य जो है, परमात्मा का ही रूप है|
देवी दुर्गा के अष्टभुजा स्वरूप का रहस्य
नवरात्र में शक्ति की उपासना है| आप देवी का पूजन करते हो, देवी को आठ भुजा हैं| ‘अष्टभुजा’ कहते हो| मैं अपने आचार्यों की मीटिंग में कह रहा था कि अगर किसी को आठ भुजा हो जायें तो क्या वह सो पाएगा, करवट ले पाएगा इधर से उधर? बोलो| छः उंगलियाँ हो जाती हैं तो एक को कटवाना पड़ता है| उस आदमी का जीवन अस्त-व्यस्त हो जाता है| तो क्या वह आठ भुजा वाला सो पाएगा? तुमको एक और सिर हो जाए तो सुखी हो जाओगे? यह सब आदमी के गुणों को प्रदर्शित करने के लिए है| देवी की आठ भुजा आठ गुणों की प्रतीक हैं| इसीलिए कहा जाता है कि आवाहन करो| देवी का आवाहन करो| शक्ति का आवाहन करो| आवाहन यानि मार्जन| मार्जन करो| लेकिन हमलोग आवाहन करने का मतलब समझ लेते हैं कि देवी प्रकट होगी| देवी कौन है? तुम्हारे अन्दर जो आत्मा है, वह देवी है| जब आवाहन करते हो तो शक्ति बढ़ती है| वह शक्ति कहाँ है? परमपिता परमात्मा में है| चारों तरफ फैली हुई है| तुम सीक्रेट साइंस (secret science) के दिव्यास्त्र का आवाहन करते हो तो शक्ति आती है| इसलिए आवाहन करो| तुम्हारी आत्मा दबी हुई है, वही आत्मा तुम्हारी प्रकट हो जाएगी| तुम विशाल हो जाओगे, तुम्हीं में देवी का प्राकट्य हो जाएगा| अब तुम कुछ भी कर सकते हो संसार में|
देवी के आठ गुण हैं –
1. पॉवर टू ड्रा योर माइंड (Power to draw your mind मन की शक्ति को समेटना)
हमारे मन का विस्तार है- वासना की तरफ बहुत तरह से फैला हुआ है| परमात्मा की तरफ नहीं जा रहा है| इसलिए देवी की पहली भुजा- गुण है- पॉवर टू ड्रा योर माइंड| अपने मन को संकुचित कर लो| खींच लो| यह बाहर-बाहर संसार में, वासनाओं में लगा है| वासना का मतलब केवल काम या सेक्स ही नहीं| पद-पैसा-प्रतिष्ठा- यह सब वासना ही कहा गया है| और यह वासना जब भड़कती है तो कण्ट्रोल नहीं होती है| इसलिए देवी का पहला गुण कहा गया है- पॉवर टू ड्रा योर माइंड| यानि खींचो अपने मन को| एकत्रित करो, ड्रा कर लो, खींच लो उसके विस्तार को| एक क्षण में समेट लो अपने मन की शक्ति को| मन को आत्मस्थ कर लो| सारी साधनाएं जो हम बताए हैं, सब इसी के लिए हैं|
2. पॉवर टू लेट गो एंड एक्सपैंशन ऑफ़ एनर्जी (Power to let go and expansion of energy, अपनी शक्ति का विस्तार)
तुम देखते हो, शक्ति की देवी दुर्गा शेर पर सवार है| वह अपनी शक्ति से शेर पर सवारी करती है कि हम ही सब कुछ नहीं करेंगे| शेर में शक्ति है| हमारे साथ जो मिलकर चल रहे हैं, हमारे अनुचर- यदि छोटा-मोटा भी कुछ अवरोध हुआ, तो वह भी अपनी शक्ति का प्रयोग करेंगे| विध्वंसकारी शक्तियों को समन (summon) करेंगे|
जब तक मूढ़ को अपनी शक्ति से सम्मान नहीं करते हो, वह मानता नहीं है| देखो मूर्ख को समझाया जा सकता है, मूढ़ को समझाया नहीं जाता है| मैं बता चुका हूँ कि मूर्ख निपढ़ होता है, गँवार होता है| पाँच साल का बच्चा मूर्ख हो सकता है, समझाए जाने पर समझ जाएगा| लेकिन जो पढ़ा-लिखा, इंटेलेक्चुअल होता है, वह तर्क-वितर्क से अपनी गलती को सही साबित करता है| यह मूढ़ है| जैसे दुर्योधन मूढ़ था| दुर्योधन को लाख कृष्ण समझाए, लेकिन देखे कि यह समझने वाला नहीं है| रावण मूढ़ है, इंटेलेक्चुअल (intellectual) है| मूढ़ और मूर्ख दो शब्द हैं| कृष्ण बार-बार गीता में मूढ़ शब्द का प्रयोग किये हैं कि मूढ़ कौन है? दुर्योधन| यह समझ नहीं सकता है| इसलिए मूढ़ को शक्ति से समन करना ही होगा| और मूढ़ को जब तक शक्ति से सम्मान नहीं किया जाएगा, तब तक विकास की गति आगे नहीं बढ़ेगी| इसलिए यहाँ पर कहा गया है कि ‘पॉवर टू लेट गो’(Power to let go)| यानि अपनी शक्ति का विस्तार करो, दण्ड देने की शक्ति रखो और मूढ़ों की सत्ता को ख़त्म कराओ| मूढ़ को दण्डित करो|
कैसे करोगे? जैसे शक्ति की देवी दुर्गा शेर पर बैठी है और शेर के माध्यम से अपनी शक्ति को भेज रही है, वैसे ही तुम भी अपनी सिद्धियों के माध्यम से किसी को शक्ति देते जाओ कि जाओ यह काम करो| यह समझो कि गुरु की पॉवर मुझमें आ गई है| शक्ति का ट्रान्सफर कैसे होगा- सब सीक्रेट साइंस में बताया जाता है| जैसे दुर्गा-शक्ति शेर पर बैठी है, जा रही है तो वह शक्ति शेर में चली गई| अब सब काम उसको नहीं करना है, वह शेर कर लेगा| इस तरह से किसी में भी एनर्जी ट्रान्सफर करके तुम उससे वह काम करा सकते हो| इसलिए अपने में ही सब पॉवर को केन्द्रित मत करो| हमलोग अपने में ही पॉवर को सेंट्रलाइज़ कर लेते हैं| इसलिए शक्ति का ही यह दूसरा रूप यह गुण है- पॉवर टू लेट गो|
3. पॉवर टू एक्सेप्ट एंड फोरगिव (Power to accept and forgive) (दोषी को आत्म-सुधार का अवसर प्रदान करना)
यदि मूर्ख अपनी गलती को स्वीकार कर लेता है, क्षमा-याचना करता है कि हमसे गलती हो गई, अब ऐसा नहीं करेंगे तो उसे एक्सेप्ट कर लो| स्वीकार कर लो कि ठीक है| जाओ, फिर मत करना | इसलिए कि किसी को नाहक तंग नहीं करना चाहिए| क्षमा कर दो|
देखो गलत से गलत आदमी को क्षमा किया जा सकता है, यदि उसमें सुधार की सम्भावना हो तब| हमारा पहला काम है समाज में सुधार लाना| यदि बेचारा वह सुधर ही जाता है तो नाहक उसको तंग क्यों करेंगे! किसी को तिरस्कृत या बहिष्कृत करके समाज की मुख्य धारा से अलग नहीं कर देना है| उसे एक्सेप्ट (accept) करने की क्षमता रखो| मौका दो| इसलिए तीसरा गुण कहा गया है-पॉवर टू एक्सेप्ट| माने संतोषी माँ का रूप| वह वात्सल्यमयी है- प्रेम से लबालब| एक माँ का यह रूप है और तुमको भी उस रूप को समझकर स्वीकार करना चाहिए|
4. पॉवर टू डिसाइड (Power to decide)
तुममें क्षमता होनी चाहिए गलत और सही में तुरंत निर्णय ले सको| तत्काल निर्णय लो| बहुत लोग होते है कि निर्णय ही नहीं करते हैं| कहेंगे कि अच्छा कल करेंगे- परसों करेंगे| जब तुम्हारी निर्णय की क्षमता कम हो जाती है तो न्याय की जगह अन्याय हो जाता है| देर होने पर न्याय नहीं मिलता है| इसलिए निर्णय की शक्ति रखो अपने में| आज भारत में न्यायिक प्रक्रिया इतनी ढीली और लचर हो गयी है कि डेट पर डेट पड़ती जाती है| तुमने बचपन में केस किया और वृद्धावस्था में मरने जाओगे, तब भी निर्णय नहीं होगा| यह देर का निर्णय असंतोष फैलाता है| देर का निर्णय निर्णय नहीं कहलाता, यह भ्रष्टाचार फैलाता है| इसलिए तुममें यह क्षमता होनी चाहिए कि तुरंत डिसाइड करो| निर्णय की शक्ति रखो अपनी|
देखो हमारे यहाँ कोटा से एक इंजीनियर आए हैं– आचार्य अनिल जी| ये कह रहे थे कि गुरुजी हम कोटा से पत्थर ले जा रहे थे| बनारस आश्रम में जो मंदिर है उसको बनाने के लिए| ट्रक में हम पत्थर रखे थे और भगवान् की मूर्ति भी रखे हुए थे| उसी ट्रक में हम बैठे थे और रात में ट्रक जब चलने लगा तो उसमें वह मार्बल- पत्थर जो था, हनुमान की मूर्ति से लड़ पड़ा कि आखिर हममें-तुममें क्या अंतर है? हम बड़े फेर में पड़ गए हैं| तुम भी उसी खदान से निकले हो, मैं भी उसी खदान से निकला हूँ| जिस जौहरी ने तुमको काटा है, हमको भी उसी ने काटा है| तुम्हारा वहाँ पूजन होगा और हम पर लोग पैर रगड़ेंगे| आखिर तुममें क्या खूबी है?
मूर्ति का पत्थर बोला कि बच्चा, तुम हथौड़ी लगते ही चकनाचूर हो गए| तुम्हें छोटे-छोटे पाट में काट दिया गया| अब वही लगाकर काम निकाला जाएगा न| हमपर हथौड़ी बरसती रही, छेनी चलती रही, मैं चकनाचूर नहीं हुआ- मूर्ति बन गया| अब मेरी पूजा होगी|
इसी तरह से तुम पर विपद आएगी, आपद आएगी, विभिन्न प्रकार की समस्याएं आयेंगी- यह हथौड़ी लगना ही है| यह उस परमात्मा रूपी जौहरी की हथौड़ी है, लगते रहेगी| जब तुम टूटोगे नहीं, तब तुमसे मूर्ति बनेगी| जो टूट गया, सड़क का कंकड़ बन गया और नहीं टूटा तो मंदिर का शंकर बन गया|
देखो, तुमलोग राम की कथा सुनते हो| जिस समय उन्हें गद्दी दी जा रही है, उसी समय वनवास दिया गया| ये अटूट थे, इसलिए भगवान् हैं| और हमलोग छोटी-छोटी समस्याओं से टूट जाते हैं| रोने लगते हैं कि अब क्या होगा? हम सोचते थे यह होगा- यह क्या हो गया? अरे यही तो है टेस्ट- टूटे तो बस हो गए रोड के कंकड़ और यदि अटूट रहे तब बन जाओगे मंदिर के शंकर| अब तुम क्या चाहते हो- यह तुम्हारे ऊपर है कि तुम्हारी श्रद्धा अटूट है या टूट| क्योंकि छोटी-छोटी बातों पर, छोटी-छोटी समस्याओं में हम टूट जाते हैं| इसी से हमारा अस्तित्व जो है खतरे में पड़ जाता है| इसलिए देवी की चौथी भुजा- गुण है पॉवर टू डिसाइड| आज अष्टमी है तो यह बात लेकर चलो कि वक्त पर लिया सही निर्णय ही जीवन को सफल और सार्थक बनाता है| जब कुछ निर्णय करना हो, ध्यान में बैठो और परमपिता परमात्मा को, गुरु और गोविन्द को आवाहन करो| जैसे ही गुरु और गोविद का तुममें आवाहन हो जाएगा, निर्णय की शक्ति आ जाएगी|
5. पॉवर टू इनवोक (Power to invoke) (आवाहन की शक्ति रखो)
आत्मा में आवाहन करो| शक्ति का आवाहन करो| ‘ईश्वर अंश जीव अविनाशी| चेतन अमल सहज सुख राशि||’ यह रामायण भी कहता है और शंकराचार्य भी कहते हैं- ‘अहं ब्रह्मास्मि’ अर्थात् मैं ही ब्रह्म हूँ | कबीरदास भी कहते हैं- ‘जब मैं था तब नहीं था तिरमतिया|’ अब दूसरा ‘क्रिएटर ऑफ़ द यूनिवर्स’ कौन आ गया? ‘आई एम द क्रिएटर ऑफ़ द यूनिवर्स’- यह तब होगा जब उस परमपिता परमात्मा का आवाहन कर लोगे| और जब आवाहन करोगे तब वही तुमसे व्यक्त होने लगेगा| इसीलिए हमारे यहाँ ‘व्यक्ति’ कहा गया है| व्यक्ति- संस्कृत का शब्द है| माने जो परमात्मा को व्यक्त करता हो| इसको इंग्लिश में कहते हैं – individual, जिसको तोड़ा न जा सके, अलग न किया जा सके| व्यक्ति को तोड़ा नहीं जा सकता, इसलिए यह परमात्मा को व्यक्त कर रहा है| अब तुमसे वह परमात्मा व्यक्त हो रहा है| इसलिए कहा गया है पॉवर टू इमर्ज| यानि उसका आवाहन करो और उसको अपने से व्यक्त होने दो|
कमज़ोर क्यों समझते हो अपने को? यदि तुम अपने को कमज़ोर समझ रहे हो, इसका मतलब तुम डिस्चार्ज हो गए हो| इसीलिए जो परमात्मा का भजन करते रहेगा, पूजन करते रहेगा, जो हम ध्यान की विधि बताए हैं वह करते रहेगा तब यह महसूस करेगा कि गुरु और गोविन्द की ऊर्जा आ रही है| मैं चार्ज होते जा रहा हूँ| और लगातार जैसे डायनामो से बैटरी को चार्ज करते रहते हो तो तुम्हारी कार चलती रहती है, उसी तरह से तुम चार्ज होते रहोगे और ध्यान करते हुए संसार में काम भी करते रहोगे| ‘कर से करम करे विधि नाना| मन राखहुँ जहाँ कृपा निधाना||’ अब तुम निरंतर चार्ज रहोगे, थकोगे नहीं| संसार में सेवा भी करोगे और सिमरन भी चलते रहेगा|
6. पॉवर टू प्रोटेक्ट/ डिफेंड (Power to protect/defend)
तुममें क्षमता होनी चाहिए अपनी रक्षा करने की| तुम पर कोई एक आदमी टूट गया, पड़ गया तो कहोगे कि गुरुजी हमको मार दिया वह| अरे कुछ जूडो-कराटा तो सीख लो| प्रत्येक लड़के-लड़की से हम कहते हैं कि शादी से पहले जूडो-कराटा ज़रूर सीख लो| देखो हर समय तुम्हारी कौन-कौन रक्षा करेगा? कहाँ-कहाँ खोजोगे? इसलिए कहा गया है- पॉवर टू प्रोटेक्ट| यानि अपनी रक्षा अपने करो| तुममें आत्मबल की कमी है| जब तुममें आत्मबल हो जाएगा, तब चाहे लड़का हो या लड़की, तुम्हारा कोई कुछ बिगाड़ नहीं सकता है| और आत्मबल के लिए तुमको साधना से गुज़रना होगा |
शरीर से चाहे तुम कितनहुँ शक्तिशाली हो, इस शक्ति से काम नहीं चलेगा| शक्तिशाली तो मारा जाता है| रावण बहुत शक्तिशाली था, मारा गया| और भगवान् राम छोटे हैं, लेकिन आत्मबल है| इसलिए अपने में आत्मबल क्रिएट करो| चाल-चरित्र-चिंतन के धनी बनो| कितनहुँ बड़ा आदमी चरित्रहीन हो जाएगा तो मारा जाएगा| क्योंकि उसकी शक्ति गिर जाती है| और चाल-चरित्र-चिन्तन का धनी आदमी देखने में कमज़ोर लगेगा, लेकिन आत्मबल का धनी होगा| नहीं मारा जाएगा| इसलिए कहा गया है- ‘सत्यमेव जयते|’ सत्य की विजय होती है| आत्मबल की विजय होती है| इसलिए ‘पॉवर टू प्रोटेक्ट’ (power to protect) तुमलोग यह क्षमता रखो कि अपनी रक्षा कर सको- ‘आत्ममोक्षार्थ जगतहितायश्च’| तब तुम अपनी भी रक्षा करोगे और जगत की रक्षा भी करोगे| जब तुम्हारी अपनी ही रक्षा नहीं होगी तब जगत की रक्षा क्या करोगे? इसीलिए हमारे यहाँ देवी को देवताओं से ज्यादा अस्त्र-शस्त्र दिए गए हैं| अष्टभुजा कहते हो न! इसका मतलब आठ भुजा हमारी हैं तो मैं अपनी रक्षा करने में समर्थ हूँ और दुश्मन यदि तुम पर प्रहार करेगा तो तुम्हारी भी रक्षा मैं करूँगी| यह है पॉवर टू प्रोटेक्ट| इसलिए शक्ति की देवी दुर्गा- शेर पर है| दुश्मन को ललकार रही है|
7. पॉवर टू डिस्ट्रॉय (Power to destroy)
हमारे यहाँ भगवान् के तीन रूप हैं, उसके तीन काम हैं- टू जेनरेट, टू ऑपरेट, टू डिस्ट्रॉय| (to generate, to operate, to destroy) यह भगवान् की ही क्षमता है कि वह जनरेशन भी करता है, ऑपरेट भी करता है और ज़रूरत पड़ने पर डिस्ट्रॉय भी करता है| इसलिए दुश्मन को समन करने की क्षमता होनी चाहिए| देवी में शक्ति है| वह निर्माण भी करती है तो बरबाद भी कर देगी| यदि कोई मूढ़ है, नहीं माना तो उसको समाप्त भी कर कर सकती है|
हमारे यहाँ भगवान् कृष्ण गीता में स्पष्ट कह दिए हैं कि विनाश भी मैं हूँ, काल भी मैं हूँ– कालोऽस्मि| कालों का काल, महाकाल मैं हूँ| यह बात जब ईसाई लोग सुनते हैं तो काँप जाते हैं कि यह कैसा आदमी है! कह रहा है कि काल भी मैं ही हूँ| यह ईसा मसीह तो नहीं कह सकता| लेकिन कृष्ण कहते हैं कि कालोऽस्मि| और कहते हैं कि कामोऽस्मि| मैं काम भी हूँ| विश्व में कोई यह कहने की क्षमता नहीं रखता है कि काम भी मैं हूँ और काल भी मैं ही हूँ|
राम के पास शक्ति थी, कृष्ण के पास शक्ति थी, शिव के पास यह शक्ति है| महापुरुषों के पास यह शक्ति होती है| दुर्गा के पास यह है| महिषासुर को मार डाली| इसलिए देवी का एक रूप महाकाली का भी है| जिसमें वह आसुरी शक्तियों का संहार कर रही है| जब तक तुममें यह क्षमता नहीं होगी कौन मानेगा तुम्हें? इसीलिए राम जंगल भी जाते हैं तो तीर-धनुष हाथ में है| तीर-धनुष क्या है? शक्ति का प्रतीक न|
मूढ़ मानता नहीं है| इसे समझाया नहीं जा सकता, न ही इसको सुधारा जा सकता है| यह विकास के मार्ग में अवरोध उत्पन्न करता है| तब? दमन की शक्ति से ही आपको आगे बढ़ना होगा| सद्विप्र समाज जब संगठित हो जाएगा, इसका अपना संविधान लागू हो जायेगा तब यह पॉवर टू डिस्ट्रॉय का भी काम कर सकता है| लेकिन अभी तुम चालाकी (कूटनीति) से भी काम ले सकते हो| किसी से झगड़ा मोल नहीं लेना है| लेकिन यह भी पॉवर रखना होगा अपने पास| यह कब होगा ? जब आपके पास कम्युनिकेशन (communication) की शक्ति यानि शंख आ जाएगा तब| दुर्गा की आठ भुजाओं में विभिन्न प्रकार के अस्त्र हैं| इससे समझ लो कि क्या-क्या क्षमता उनमें है|
8. पॉवर ऑफ़ रिकंस्ट्रक्शन एंड रिहैबिलिटेशन (Power of reconstruction and rehabilitation)
यदि कोई मंदिर पुराना, जर्जर हो गया है, उसमें हम प्रार्थना नहीं कर सकते हैं तो वह मंदिर गिराया जाता है| वह इसलिए नहीं गिराया जाता है कि हम विध्वंस कर रहे हैं लेकिन उसे गिराया जा रहा है कि उस पर हम नया मंदिर खड़ा करेंगे, भव्य मंदिर खड़ा करेंगे| पहले यह दस आदमी के लिए था, अब इसमें एक साथ एक हज़ार लोग प्रार्थना करेंगे|
यह देवी की आठ भुजा, आठ गुण हैं| इसलिए आप लोगों को भी इन्हें अपना लेना चाहिए| यही शक्ति की उपासना है| जब यह आठ गुण आप लोगों में आ जायेंगे, तब सद्विप्र समाज का भी काम हमारा पूरा हो जाएगा| आज बस इतना ही, आपने मुझे ध्यान से सुना आपका बहुत-बहुत धन्यवाद। आपके अंदर बैठे भगवान को मेरा नमन।
||हरि ॐ||
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‘समय के सदगुरु’ स्वामी कृष्णानंद जी महाराज
आप सद्विप्र समाज की रचना कर विश्व जनमानस को कल्याण मूलक सन्देश दे रहे हैं| सद्विप्र समाज सेवा एक आध्यात्मिक संस्था है, जो आपके निर्देशन में जीवन के सच्चे मर्म को उजागर कर शाश्वत शांति की ओर समाज को अग्रगति प्रदान करती है| आपने दिव्य गुप्त विज्ञान का अन्वेषण किया है, जिससे साधक शीघ्र ही साधना की ऊँचाई पर पहुँच सकता है| संसार की कठिनाई का सहजता से समाधान कर सकता है|
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